Monday, August 2, 2010

वो शक्श ....!!!


ये भीगी शामो का गहराता हुआ सन्नाटा कहा ले जा रहा है ...... कुछ अनकही कहानियो को बया कर रहा है , मै तलाशती उसे हर हवा के जोके मै... कानो मै जैसे वही हवाए सरगोशियाँ कर रही थी ... कही मुड के देखा तोह कोई ना था वह पर फिर भी ना जाने क्यों उसके होने का एहसास छुआ जा रहा था..... वो एहसास बंध पलकों के नीचे एक याद बन कर मचल सा गया ..... वो शक्श याद बन कर रुला सा गया.....


पलक

6 comments:

sanu shukla said...

aisa hi hota hai...umda bhav..!!

Udan Tashtari said...

अच्छा लेखन...भावपूर्ण.


जोके = झोंके

संजय भास्कर said...

हमेशा की तरह बहुत शशक्त रचना है...भावनाओं को शब्द देना कोई आपसे सीखे...बेहतरीन...मेरा अभिवादन स्वीकार करें...

संजय भास्कर said...

छोटी सी कविता गहरी सी बात कह दी..

raaaj said...

Saanwali Si Ek Ladki
Dhadkan Jaisi Dilki
Dekhke Jiske Woh Sapne
Kahin Woh Main To Nahin.....

sunil said...

Kyun log yu chhod ke chale jaatein hai? Jaana hi tha to chale jaate..saath mein apani "yaadein" bhi le jaate! shayad unki yaado pe shayad unka bhi huqq nahi hai...kyun ki yeh ab meri ho chuki hai...unki nahi!!!!