Sunday, May 30, 2010





दर के उल्फत के इरादे पे ज़रा फिर सोच ले,

में चली जाउंगी और तु देखता रह जायेगा ,

ये नहीं कहते की तुझ बिन जी नहीं पायेंगे हम,

हाँ मगर जिंदगी में एक कमी रह जाएगी,

प्यार के सदके ये लगता है हमारे दरमियाँ,

और कुछ ना भी रहे तो ये दोस्ती रह जाएगी,

में तो तय कर के चली जाउंगी दुनिया के सफ़र से ..

मेरे बारे में ये दुनिया सोचती रह जाएगी,

में अगर ना भी रहू, तो ये शायरी रह जाएगी………

Palak

3 comments:

संजय भास्कर said...

आप बहुत सुंदर लिखती हैं. भाव मन से उपजे मगर ये खूबसूरत बिम्ब सिर्फ आपके खजाने में ही हैं

संजय भास्कर said...

कमाल की प्रस्तुति ....जितनी तारीफ़ करो मुझे तो कम ही लगेगी

n said...

great to read naveen