Thursday, August 4, 2011

"कितनी महोब्बत है तुम से "

कब से कहने की हिम्मत जुटा रहे है 
के तुम से इज़हारे महोब्बत कर ले 
पर  न जाने आज ऐसा क्या हुआ 
के दिल ने कहा की 
कह ही दू आज 



जब किताब के पन्नो की सफेदी 
तुम्हारे चेहरे पर छलकती है 
दिल कही रुक सा जाता है 

जब हसी की एक ठंडी लहर 
मेरे कानो मई गूंजती है 
वक़्त कही थम सा जाता है 

ना जाने आज ऐसा क्या हुआ 
दिल ने कहा 
की कह दू आज 
"कितनी महोब्बत है तुम से "

9 comments:

Raj said...

OMG!

"कितनी महोब्बत है तुम से" bahut hi sundar ehsaash hai yeh aapke.....kasam se....kuchh purani baatein Taza ho gayi......

Aaap bahut sundar likhti ho Palak....

amul said...

Jis raah pe, hai ghar tera
Aksar wahan se, haan main hoon guzra
shayad yahin dil mein raha
Tu mujh ko mil jaye, Kya pata...

Kya hai yeh silsala
Janu naa, Main janu naa
Dil sambhal ja zara
Phir mohabbat karne chala hai tu
Dil yahin ruk ja zara
Phir mohabbat karne chala hai tu

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

खूबसूरत ... पर अब कह ही दो वरना बाद में कहीं पछताना न पड़े

वन्दना said...

वाह …बहुत सुन्दर्।

๑♥!!अक्षय-मन!!♥๑, said...

बस इसी को मोहब्बत कहते हैं जिसे आपने अपने शब्दों से और निखार दिया .
अक्षय-मन

mridula pradhan said...

bahut pyari likhi......

S.N SHUKLA said...

सुन्दर रचना, खूबसूरत अंदाज़

सदा said...

बहुत ही अच्‍छी रचना ...आभार ।

Dorothy said...

खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
सादर,
डोरोथी.