Wednesday, November 5, 2008

मेरे नाम पर मरती थी ....

कभी शर्मा के , कभी मुस्का के , आचल को सवारा करती थी ,
कभी हम पे क़यामत मरती थी, कभी हम क़यामत पे मरते थे ,

चलते चलते रुक जन, कुर्ती की सलवटों को सुल्जाना ,
भोली सूरत वाली वो ऐसे ही नज़ारा करती थी ,

मिलते ही नजर मुस्का देना और पलकों को जपका देना ,
मस्त निगाहों से अक्सर वो उही इशारा करती थी ,

जब घर से न आना होता था उस का .
तब देर तलक छत पर वो जुल्फ सवार करती थी

लोगों के सौ सौ ताने और बदनामी के अफसाने ,
मेरी खातिर न जाने वो क्या क्या गवारा करती थी....

थी वो मेरी बस मेरे नाम पर मरती थी ....
पलक .....PG

5 comments:

Ravi Srivastava said...

…वाकई आपने बहुत अच्छा लिखा है। आशा है
हमें और अच्छी -अच्छी रचनाएं पढ़ने को मिलेंगे
बधाई स्वीकारें।
“उसकी आंखो मे बंद रहना अच्छा लगता है
उसकी यादो मे आना जाना अच्छा लगता है
सब कहते है ये ख्वाब है तेरा लेकिन
ख्वाब मे मुझको रहना अच्छा लगता है.”
...रवि
http://meri-awaj.blogspot.com/

Anonymous said...

मेरी खातिर न जाने वो क्या क्या गवारा करती थी…


Pearl...

adil farsi said...

तब देर तलक छत पर वो जुलफ संवारा करती थी.. अच्छी कविता है

Rishi said...

थी वो मेरी बस मेरे नाम पर मरती थी ....

sach mai ye last line mai jo hai wo mai bayan nahi kar sakta .. really awesome

makrand said...

लोगों के सौ सौ ताने और बदनामी के अफसाने ,
मेरी खातिर न जाने वो क्या क्या गवारा करती थी....
beautifully expressed