Tuesday, August 26, 2008

आरजू है की...!







आरजू है की ...
मेरी मुठी मैं समेटे सपनो को सच्ची बना देना
मेरी आखों की नमी को खुशियों का अंजाम देना
मेरी एक हसी के लिए सारी हदें पार कर देना
मेरी खामोशी को भी तुम जुबा देना
ऐ जिन्दगी तुज से अब और क्या मांगे
बस उनके नाम की ये लकीर
सदा यूँही मेरे हाथों मैं रहे
लम्हातो की दुनिया यु ही महकती रहे
और जिन्दगी के मायने ऐसे ही बने रहे ..

बस ये आरजू है मेरी.. पलक

3 comments:

Anonymous said...

ऐ जिन्दगी तुज से अब और क्या मांगे
बस उनके नाम की ये लकीर
सदा यूँही मेरे हाथों मैं रहे
Pearl...

amul said...

Hi Pal,

its great poem!!


"If I know what love is, it is because of you".

सुमित प्रताप सिंह said...

tumhari duaa kabool ho.aameen...